WTO में IFD समझौते पर भारत का विरोध: निवेश सुविधा बनाम नीतिगत स्वायत्तता

Why India Opposes IFD Agreement in WTO? Full Analysis by Ravi Kumar Manjhi

विश्व व्यापार संगठन (WTO) में प्रस्तावित विकास के लिये निवेश सुविधा (Investment Facilitation for Development – IFD) समझौता को लेकर भारत ने स्पष्ट असहमति जताई है। जहाँ कई देश इसे निवेश को सरल और आकर्षक बनाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम मान रहे हैं, वहीं भारत इसे अपने नीतिगत अधिकारों और बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के लिये चुनौती के रूप में देखता है।

IFD पहल की शुरुआत वर्ष 2017 में चीन के नेतृत्व में विकासशील और अल्प विकसित देशों के एक समूह द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य निवेश प्रक्रियाओं को आसान बनाना, नौकरशाही अड़चनों को कम करना और व्यापार संचालन को अधिक सुगम बनाना है। इस समझौते को बहुपक्षीय रूप में प्रस्तावित किया गया है, जो केवल उन विश्व व्यापार संगठन सदस्यों पर लागू होगा जो इसे स्वेच्छा से स्वीकार करेंगे। इसके समर्थकों का दावा है कि इसमें बाजार पहुँच, निवेश संरक्षण, निवेशक राज्य विवाद समाधान (ISDS) और सरकारी खरीद जैसे संवेदनशील मुद्दों को शामिल नहीं किया गया है।


भारत की प्रमुख आपत्तियाँ इस समझौते की प्रकृति और प्रभाव को लेकर हैं। भारत का मानना है कि निवेश सुविधा WTO के मूल दायरे से बाहर का विषय है। WTO की स्थापना मुख्य रूप से वस्तुओं, सेवाओं और बौद्धिक संपदा के व्यापार को विनियमित करने के लिये हुई थी। ऐसे में, बिना सर्वसम्मति के निवेश जैसे मुद्दे को शामिल करना मराकेश समझौते की भावना के विपरीत है।


इसके अलावा, भारत को यह भी आशंका है कि “इच्छुक देशों के समूह” के माध्यम से IFD को आगे बढ़ाने से WTO की सर्वसम्मति आधारित प्रणाली कमजोर हो सकती है। इससे एक “दो-स्तरीय” ढाँचा बन सकता है, जिसमें बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का प्रभाव अधिक होगा और विकासशील देशों की सामूहिक आवाज़ को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। नीतिगत स्वायत्तता का प्रश्न भी भारत के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। IFD के अंतर्गत प्रस्तावित अपील तंत्र और जाँच व्यवस्था विकासशील देशों की घरेलू नीतियों पर दबाव बना सकते हैं। भारत का मानना है कि हर देश को अपनी आर्थिक परिस्थितियों, राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास आवश्यकताओं के अनुसार विदेशी निवेश को नियंत्रित करने की स्वतंत्रता होनी चाहिये।


विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत का यह रुख केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। भारत इस मुद्दे का उपयोग WTO में लंबित दोहा विकास एजेंडा के मुद्दों विशेषकर खाद्य सुरक्षा के लिये सार्वजनिक भंडारण (PSH) के स्थायी समाधान पर दबाव बनाने के लिये कर रहा है। यह मुद्दा वर्ष 2013 के बाली “शांति खंड” के बावजूद अब तक अनसुलझा है और भारत की MSP व्यवस्था तथा प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना जैसी योजनाओं के लिये अत्यंत आवश्यक है। दूसरी ओर, IFD समझौते को चीन के दृष्टिकोण से भी देखा जा रहा है। इस समझौते का समर्थन करने वाले 128 देशों में से 98 देश चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) से जुड़े हैं। ऐसे में, नियामकीय प्रक्रियाओं के मानकीकरण के माध्यम से यह समझौता चीन के वैश्विक अवसंरचना नेटवर्क और विदेशी निवेश विस्तार को परोक्ष रूप से मजबूती दे सकता है, खासकर उन क्षेत्रों में जो भारत के लिये रणनीतिक रूप से संवेदनशील हैं।


आगे की राह के रूप में भारत का मानना है कि WTO को नए समझौतों की बजाय पहले दोहा विकास एजेंडा के लंबित मुद्दों जैसे कृषि सब्सिडी, विशेष एवं विभेदक व्यवहार और विवाद निपटान तंत्र की बहाली पर ध्यान देना चाहिये। इसके साथ ही, भारत एक कठोर वैश्विक ढाँचे के बजाय लचीली द्विपक्षीय निवेश संधियों (BITs) को प्राथमिकता देता है, जिससे वह निवेश आकर्षित करते हुए अपनी नीतिगत स्वतंत्रता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सके। साथ ही, भारत अन्य विकासशील देशों के साथ समन्वय बढ़ाकर WTO की बहुपक्षीय प्रकृति को बनाए रखने का प्रयास कर सकता है और IFD पर अपने रुख का उपयोग एक प्रभावी सौदेबाज़ी के साधन के रूप में कर सकता है।


अंततः, IFD समझौते पर भारत का दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि वह निवेश को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ अपनी नीतिगत स्वायत्तता, खाद्य सुरक्षा और रणनीतिक हितों से समझौता करने के पक्ष में नहीं है। यही संतुलन उसकी वैश्विक व्यापार नीति की दिशा तय करता है।


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लेखक: रवि कुमार माँझी

संपर्क: bilingualbyravi@gmail.com
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